जायसी के पद्मावत की कथानक रूढी, जायसी की काव्य दृष्टि, जायसी के पद्मावत में लोकतत्व और प्रेम भावना, Jayasi poet

 जायसी के पद्मावत की कथानक रूढी, जायसी की काव्य दृष्टि, जायसी के पद्मावत में लोकतत्व और प्रेम भावना, Jayasi poet

 कथानक रूढी --  

कवि परंपरा में विशेषकर प्रेम काव्य परंपरा में कुछ काव्य रूढ़ियां चली आ रही थी । जैसे,  किसी पक्षी द्वारा प्रेम संदेश भेजना, प्रेम पात्र माशूका में परमात्मा का साक्षात्कार करना , प्रेमी साधक के मार्ग की अतिशय कठिनाइयों का वर्णन करना,  किसी अलौकिक सहायता द्वारा प्रेम पात्र की प्राप्ति होना आदि । जायसी के पद्मावत में हमें प्रायः समस्त काव्य रूढ़ियों का निर्वाह मिल जाता है। 

( क ) सिंघल द्वीप के राजा गंधर्व सेन की कन्या पद्मावती अद्वितीय सुंदरी थी। हीरामन नामक सुआ चित्तौड़ के राजा रतन सेन से पद्मावती के सौंदर्य का वर्णन करता है। वर्णन सुनकर राजा मूर्छित हो जाता है। अंत में उसकी खोज में योगी बन कर निकल पड़ता है। हीरामन तोता गुरु की भूमिका निभाता है।

गुरु सुआ जेहि पंथ दिखावा । बिनु सतगुरु को निर्गुण पावा।।

(ख ) योगी रतनसेन के साथ सोलह हजार कुंवर योगियों के वेश में चलते हैं। मार्ग में उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। मार्ग की कठिनाइयां साधना के मार्ग में आने वाले कठिनाइयों की व्यंजना करते हैं।

( ग )  लौकिक नेत्रों से अलौकिक सौंदर्य के दर्शन संभव नहीं है तभी तो प्रथम साक्षात्कार में रतनसेन मूर्क्षित हो जाते हैं।

( घ) सिंहल द्वीप में राजा रतन सेन को सूली पर चढ़ाने की तैयारी चल रही है तभी सोलह हजार योगी गढ़ को घेर लेते हैं । भगवान शिव, हनुमान आदि देवतागण योगियों की सहायता करने आ जाते हैं। भगवान शिव की आज्ञा से पद्मावती और रत्न सेन का विवाह हो जाता है।

काव्य दृष्टि


पंडित रामचंद्र शुक्ल के अनुसार " कबीर ने केवल भिन्न प्रतीत होती हुई सत्ता की एकता का आभाष दिया था । प्रत्यक्ष जीवन की एकता का दृश्य सामने रखने की आवश्यकता बनी रही थी , वह जायसी द्वारा पूरी हुई।" पद्मावत जायसी का सर्वाधिक प्रसिद्ध ग्रंथ है। पद्मावत को पढ़ने से ऐसा लगता है कि उनका हृदय बड़  कोमल था। चाहे लोक पक्ष हो अथवा आध्यात्म पक्ष , दोनों ओर उसकी गूढता , गंभीरता और सरसता विलक्षण दिखाई देती है। 

जायसी के पद्मावत के कथानक में कल्पना और इतिहास का सुन्दर समन्वय स्थापित किया गया है। रानी पद्मावती को निर्गुण ब्रह्म के पार्थिव रूप में प्रस्तुत किया गया है। उसके सौन्दर्य वर्णन में पारलौकिक सौंदर्य की व्यंजना की गई है। ग्रंथ के अंत में जायसी ने अपनी काव्य दृष्टि को स्पष्ट कर दिया है।

" तन चितौड़ मन राजा कीन्हां। सिर सिंहल बुद्धि पदमिनी चिन्हा।।
गुरु सुआ जेहि पंथ दिखावा। बिनु सतगुरु को निर्गुण पावा।।"

पद्मावत की भाषा पूर्वी अवधी है जिसमें ठेठ अवधी का मिठास भरा ह।

पद्मावत में लोकतत्व 

ऐसा कहा जाता है कि जायसी ने पद्मावत में लोकतत्व को भूलाकर प्रेम का चित्रण करने में व्यस्त रहे हैं। परन्तु यह कथन निराधार है। पद्मावत में प्रेम कथा के साथ-साथ सामाजिक एवं पारिवारिक जीवन में भारतीय संस्कृति भी जीवंत हुईं हैं। इसकी कर पूर्ण रूप से हिंदू जीवन और संस्कृति से संबंधित है। मानव - मानव को एक उच्च मनोभूमि पर खड़ा करके धर्म , जाति आदि की कृतिम दीवारों को तोड़कर मानव मात्र को एक सूत्र में बांधना ही पद्मावत का महान उद्देश्य है।

प्रेम भावना 

जायसी कृत पद्मावत हिन्दी प्रेमाख्यानक परंपरा का सर्वश्रेष्ठ प्रबंध काव्य माना जाता है। इस ग्रंथ में चितौड़ के राजा रतन सेन और सिंहल गढ़ की राजकुमारी पद्मावती की प्रेम कहानी का बड़ा ही भावाकुल वर्णन किया गया है। पद्मावत कथा के दो पक्ष हैं - पूर्वार्ध भाग में कल्पना का आधिक्य है । पूर्वार्ध में राजा रतन सेन एकांत प्रेम की परिचारिका है। कथा के उत्तरार्ध में हिन्दू जीवन पद्धति का सुन्दर और यथार्थ वर्णन मिलता है। वास्तव में जायसी का सारा ध्यान प्रेम की उदात्त रूप की प्रतिस्थापन पर केन्द्रित है। वास्तव में प्रेम भावना ही मानव की सर्वाधिक प्रबल भावना है, इसे जायसी खूब समझते थे।

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