शहीद रामप्रसाद बिस्मिल , Shahid Ramprasad Bismil , biography
अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल , Amar Shaheed Ramprasad Bismil, biography
" मालिक तेरी रज़ा रहे और तू ही तू रहे,
बाकी न मैं रहूं न मेरी आरज़ू रहे।
जब तक कि तन में जान, रगों में लहू रहे,
तेरा ही जिक्र या तेरी ही जुस्तजू रहे।।"
राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म 1897 ई में हुआ था। ऊर्दू की चौथी कक्षा पास करने के बाद जब वे पांचवीं कक्षा में पहुंच तब उनकी आयु 14 वर्ष की थी।
बचपन में उन्हें कुछ बुरी आदतों ने घेर लिया था लेकिन उसी समय मुंशी इंद्रजीत से उनका मेल जोल हुआ और उन्होंने संध्या सीखी।
बिस्मिल लिखते हैं -- "सत्यार्थ प्रकाश " के अध्ययन से मेरा काया पलट हो गया। उन्हीं दिनों शाहजहांपुर में स्वामी सोमदेव जी का आगमन हुआ। उनके भाषणों का मुझ पर अच्छा प्रभाव पड़। मैं धर्म - कर्म में लीन हो गया और इतना सत्यवक्ता बन गया कि एक बार पिता जी किसी पर दावा करके वकील से कह गए कि जो काम हो वह मुझसे करवा लें। वकील ने मुझे पिता जी का हस्ताक्षर करने को कहा। उस समय घर की स्थिति कुछ अच्छी न थी और हस्ताक्षर न करने से सौ रुपए की हानी हो रही थी। फिर भी मैंने स्पष्ट कह दिया - यह धर्म विरुद्ध है , मैं ऐसा कभी नहीं कर सकता।
उन्हीं दिनों समाचार पत्रों में लाहौर षड्यंत्र के अभियुक्तों के संबंध में निर्णय प्रकाशित हुआ जिसमें भाई परमानन्द जी जैसे महान पुरुष को फांसी की सजा दी गई थी। यह समाचार सुनकर बिस्मिल के हृदय में विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी। उन्होंने ब्रिटिश सरकार से बदला लेने का संकल्प लिया। यहीं से उनके हृदय में क्रांतिकारी विचारों का सूत्रपात हुआ।
बिस्मिल जब नौवीं कक्षा में थे तभी लखनऊ में अखिल भारतीय कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। इसमें वे बड़े उत्साह से सम्मिलित हुए। यहीं उन्हें क्रांतिकारी संगठनों का पता चला। वे भी इस समिति के सदस्य बन गये। इस समिति के सदस्य दो प्रकार के कार्य करते थे - धन एकत्रित कर हथियार जुटाना और विभिन्न राज्यों में सदस्य बनाना। समिति के लिए धन जुटाने के उद्देश्य से बिस्मिल ने एक पुस्तक लिखी , नाम था - " अमेरिका को स्वतंत्रता कैसे मिली " । उन्होंने बाद में तीन पुस्तकें और लिखी। नाम था - कैथेराइन, स्वदेशी रंग, और क्रांतिकारी जीवन। इनमें पहली दो पुस्तकें प्रकाशित हुई लेकिन तीसरी पुस्तक प्रकाशित करने वाले कोई प्रकाशक तैयार नहीं हुआ। बिस्मिल स्वतंत्र व्यवसाय करने लगे जिससे उनकी घर की स्थिति सुधर गई थी।
रामप्रसाद बिस्मिल की इच्छा थी कि वह भी अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध कुछ करें। वह अपने व्यवसाय को छोड़कर फिर से संगठन के काम में लग गए। उन दिनों असहयोग आंदोलन के शिथिल हो जाने के कारण अनेक युवक क्रांतिकारी आंदोलन की ओर सक्रिय हो गए थे। लेकिन पुलिस के भय से उन संगठनों को आर्थिक सहायता नहीं मिल पा रही थी। इसलिए निश्चय किया गया कि किसी छोटे स्टेशन के पास रेलगाड़ी से सरकारी खजाने को लूट लिया जाए। काकोरी स्टेशन पर सरकारी खजाना लूट लिया गया।
काकोरी लूट कांड में बिस्मिल पकड़े गए। उनका मुकदमा मजिस्ट्रेट आईनुद्दीन के कचहरी में चल रहा था। इस मुकदमे में बिस्मिल ने अपनी पैरवी खुद ही की थी। उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। 19 सितंबर 1927 को बिस्मिल ने हंसते - हंसते फांसी के फंदे पर झूलकर अपना शीश भारत माता के चरणों में अर्पित कर दिया।
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