जयशंकर प्रसाद
A biography of famous poet Jayashankar Prasad, जयशंकर प्रसाद की जीवनी, छायावाद के प्रवर्तक कवि जयशंकर प्रसाद
जीवनी विवरण
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जन्म
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30 जनवरी 1889
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जन्म स्थान
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वाराणसी (काशी), उत्तर प्रदेश
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पारिवारिक पृष्ठभूमि
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प्रसिद्ध 'सुंघनी साहू' वैश्य परिवार
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पिता का नाम
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बाबू देवीप्रसाद साहू
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माता का नाम
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मुन्नी देवी
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शिक्षा
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औपचारिक शिक्षा क्वींस कॉलेज (वाराणसी) में कक्षा 8 तक; तत्पश्चात घर पर ही संस्कृत, हिंदी, फारसी, अंग्रेजी और उर्दू का स्वाध्याय
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साहित्यिक युग
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छायावाद (छायावादी काव्यधारा के प्रवर्तक)
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प्रमुख काव्य रचनाएँ
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कामायनी (महाकाव्य), आँसू, झरना, लहर, कानन कुसुम, प्रेम पथिक
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प्रमुख नाटक
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चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, अजातशत्रु, राज्यश्री, जनमेजय का नाग-यज्ञ
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प्रमुख उपन्यास
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कंकाल, तितली, इरावती (अपूर्ण)
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प्रमुख कहानी संग्रह
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छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आंधी, इंद्रजाल
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निबंध संग्रह
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काव्य और कला तथा अन्य निबंध
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मुख्य भाषा-शैली
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तत्समप्रधान शुद्ध परिमार्जित खड़ी बोली, भावात्मक एवं चित्रात्मक शैली
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निधन
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15 नवंबर 1937 (वाराणसी)
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हिंदी साहित्य के छायावाद के प्रवर्तक कवि जयशंकर प्रसाद का जन्म 1889 ई में वाराणसी, उत्तर प्रदेश में हुआ था इनके पिता का नाम बाबू देवक प्रसाद था। इनका परिवार सुघनी साहू के नाम से प्रसिद्ध था । प्रसाद जी काशी के प्रसिद्ध क्वींस कॉलेज में पढ़ने गए थे परंतु पिता की आकस्मिक मृत्यु और आर्थिक कठिनाइयों के कारण आठवीं कक्षा से आगे नहीं पढ़ सके। बाद में हिंदी, संस्कृत, फारसी, उर्दू आदि भाषाओं का अध्ययन घर पर ही किया।
जयशंकर प्रसाद जी ने वेद उपनिषद के साथ इतिहास पुराण और दर्शन का गहन अध्ययन किया था । उनकी पत्नी का निधन युवावस्था में ही हो गया था , जिसकी वेदना का प्रभाव प्रसाद की काव्य रचनाओं में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। जयशंकर प्रसाद जी लंबी बीमारी के बाद सन 1937 में स्वर्ग सिधार गए।
काव्यगत विशेषताएं -- छायावादी कवि होने के कारण प्रसाद जी के काव्य में छायावादी कविता के सभी गुण जैसे काल्पनिकता, प्रकृति प्रेम, देश प्रेम, सौंदर्य वर्णन आदि मिलते हैं । प्रसाद जी के काव्य में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का प्रयोग सर्वथा नवीन रूप से हुआ है। प्रसाद जी के काव्य में रहस्यवादी तत्व भी पाए जाते हैं । उन्होंने प्रकृति का मानवीकरण रूप में काव्य में प्रस्तुत किया है। अर्थात प्रकृति को मनुष्य के रूप में अंकित किया है । उनकी कविता मानव में ईश्वर और ईश्वर में मानव देखती है। उन्होंने आंतरिक अनुभूतियों के साथ समकालीन विषयों पर भी काव्य लिखे हैं।
जयशंकर प्रसाद की लिखी प्रमुख रचनाएं -- कामायनी, कंकाल, तितली, इरावती, आकाशदीप, आंधी, इंद्रजाल, चित्रधार , चंद्रगुप्त , स्कंदगुप्त, ध्रुवस्वामिनी आदि।
भाषा शैली -- जयशंकर प्रसाद जी की रचनाओं में खड़ी बोली का प्रयोग मिलता है। इनकी कविताओं में छायावाद काव्य की सभी विशेषताएं --- कल्पनिकता, प्रकृति प्रेम, देश प्रेम और शैली की लाक्षणिकता दृष्टिगोचर होती है। उनकी भाषा कही सरल है तो कहीं किलिस्ट। काव्य की भाषा भावानुकूल है। अतः तत्सम शब्दों की अधिकता स्वभाविक लगती है। रूपक, उपमा, उत्प्रेक्षा, मानवीकरण अलंकारों का बहुत सुंदर प्रयोग हुआ है । छोटे-छोटे पदों में गंभीर भाव भरना और लय प्रदान करना उनकी शैली की प्रमुख विशेषता है। प्रसाद जी के काव्य में एक प्रकार की मोहकता और मादकता मिलती।
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