बाबू वीर कुंवर सिंह जीवन परिचय, A biography of Babu Veer Kunwar Singh

 बाबू वीर कुंवर सिंह जीवन परिचय, A biography of Babu Veer Kunwar Singh

Veer Kunwar Singh

सन 1857 ई के स्वतंत्रता संग्राम के महानायक बाबू वीर कुंवर सिंह बिहार के शाहाबाद जिले के जगदीशपुर में सन् 1782 ई में हुआ था। इनके पिता का नाम साहब जादा सिंह और माता का नाम पंचरत्न कुंवर था । बाबू साहब जादा सिंह जगदीशपुर रियासत के जमींदार थे। बाबू कुंवर सिंह ने हिंदी , संस्कृत , फारसी आदि की शिक्षा घर पर ही प्राप्त की थी लेकिन इनका मन पढ़ाई से अधिक घुड़सवारी, तलवारबाजी, कुश्ती आदि साहसिक कार्यों में लगता था।

सन् 1827 में पिता की मृत्यु के बाद बाबू कुंवर सिंह ने रियासत की जिम्मेदारी संभाली । उन दिनों ब्रिटिश हुकूमत का अत्याचार चरम पर था। कृषि, उद्योग , व्यापार आदि का बहुत बुरा हाल था । लोग त्राहि-त्राहि कर रहे थे। राज रजवाड़ों का भी बुरा हाल था। इससे ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ देशभर में असंतोष फैल गया था। ऐसी स्थिति में बाबू वीर कुंवर सिंह ने ब्रिटिश हुकूमत से लोहा लेने का संकल्प लिया।

उन दिनों जगदीशपुर के जंगलों में बसूरिया बाबा नामक एक प्रसिद्ध संत रहते थे । कहते हैं, उन्होंने ही बाबू वीर कुंवर सिंह को देश भक्ति और स्वाधीनता की प्रेरणा दी थी। उन्होंने बनारस, मथुरा , कानपुर, लखनऊ, आजमगढ़ आदि स्थानों की यात्राएं की और विद्रोह की योजना बनाई। सोनपुर मेला जो एशिया का प्रसिद्ध पशु मेला है, वहां जाकर भी उन्होंने कई गुप्त बैठकें की।  देशभक्त स्वतंत्रा सेनानी वहां जाकर क्रांति की योजनाएं बनाते थे।

बैरकपुर में अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत करने के कारण मंगल पांडे को फांसी दे दी गई। 10 मई अट्ठारह सौ सत्तावन को मेरठ में भारतीय सैनिकों ने ब्रिटिश अधिकारियों के विरुद्ध आंदोलन छेड़ दिया। कई अंग्रेज अफसरों को मार कर उन्होंने दिल्ली पर कब्जा कर लिया और अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को भारत का शासक घोषित कर दिया। विद्रोह की आग पूरे देश में फैल गई। बाबू वीर कुंवर सिंह जैसे वयोवृद्ध योद्धाओं ने ब्रिटिश शासन की जड़ें हिला कर रख दी।

25 जुलाई 1857 को दानापुर छावनी के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। वे सोन नदी पार कर आरा की ओर चल पड़े। उन्हें बाबू कुंवर सिंह के साहस और शौर्य पर अटूट विश्वास था। उन्होंने 27 जुलाई 1857 को आरा को अंग्रेजों से मुक्त करा दिया । 80 वर्षीय बूढ़े शेर के नेतृत्व में आरा शहर क्रांति का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। क्रांति की ज्वाला पूरे बिहार में फैल गई । वीर कुंवर सिंह आज़ादी के अन्य दीवानों से मिलकर इस संघर्ष को और आगे बढ़ाना चाहते थे । उन्होंने सासाराम के रास्ते मिर्जापुर, रीवा, कालपी, कानपुर , लखनऊ आदि जगहों की यात्राएं की उनकी वीरता और साहस की कृति पूरे उत्तर भारत में फैल गई। बाबू कुंवर सिंह की वीरता और शोहरत ने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी।

स्वतंत्रता के अमर सेनानी बाबू वीर कुंवर सिंह युद्ध कला में बड़े निपुण थे। वे छापामार युद्ध में भी खूब माहिर थे। उनके रण कौशल को समझना अंग्रेजों के लिए असंभव था। कहते हैं , एक बार बाबू कुंवर सिंह को अपनी सेना के साथ गंगा पार जाना था । अंग्रेजी सेना उनके पीछे लगी थी । बाबू कुंवर सिंह ने अपनी चालाकी से अंग्रेजों को चकमा देने का निश्चय किया। उन्होंने अफवाह फैला दी कि अपनी सेना को हाथियों पर चढ़ाकर बलिया से गंगा पार करवाएंगे । इस बात की भनक अंग्रेज अफसर डग्लस को लग गई। उसने एक बड़ी सेना लेकर बलिया के गंगा तट को घेर लिया। बाबू कुंवर सिंह  परी चतुराई का परिचय देते हुए वहां से 7 मील दूर शिवराजपुर नामक स्थान से नावों द्वारा अपनी सेना को गंगा पार करा दिया।

जब डग्लस को इस बात की सूचना हुई तो वह दल बल के साथ भागते हुए शिवराजपुर पहुंचा लेकिन तब तक बाबू कुंवर सिंह की पूरी सेना गंगा पार कर चुकी थी। एक अंतिम नाव पार जाना बाकी रह गई थी, उसी पर बाबू कुंवर सिंह भी सवार थे।  डग्लस को मौका मिल गया । उसने अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दी । दुर्भाग्य से एक गोली बाबू कुंवर सिंह की बाई कलाई में जा लगी। ख़ून का फव्वारा निकल चला परंतु उनके चेहरे पर जरा सी भी शिकन नहीं आई । उन्होंने गंगा मैया को बड़ी भावपूर्ण नेत्रों से देखा और यह कहते हुए कि हे गंगा मैया अपने प्यारे पुत्र की यह कंचन भेंट स्वीकार करो अपने बाएं हाथ काट कर गंगा में प्रवाहित कर दिया।

बाबू वीर कुंवर सिंह अंग्रेजों से लोहा लेने के साथ-साथ कई साहसिक और सामाजिक तथा धार्मिक कार्य करने के लिए भी प्रसिद्ध है। उन्होंने कई सडके, कुएं और तालाबों का निर्माण करवाया। आरा का जिला स्कूल उन्हीं की देन है । उनके दरवाजे से कोई याचक खाली हाथ नहीं लौटता था ।उनमें धार्मिक एकता और सहिष्णुता कूट-कूट कर भरी थी। इब्राहिम खान और किफायती हुसैन उनकी सेना में उच्च पदों पर आसीन थे। 2 6 अप्रैल 1858 को बाबू कुंवर सिंह इस संसार से विदा हो गए परंतु उनके साहस , शौर्य, वीरता और युद्ध कला की गाथा सदैव याद रहेगी।

चला गया वह कुंवर अमरपुर साहस से सब अरि दलजीत ।

उसका चित्र देखकर अब भी दुश्मन होते हैं भयभीत।

 वीर प्रस्विनी भूमि धन्य वह धन्य वीर वह धन्य अतीत

 गाते थे और गाएंगे हम हरदम उसकी जय का गीत 

स्वतंत्रता का सैनिक था आजादी का दीवाना था 

सब कहते हैं कुंवर सिंह भी बड़ा वीर मर्दाना था।

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