Krishn bhakt kavi aur Raskhan कृष्ण भक्त कवि और रसखान


कृष्ण भक्त कवि रसखान

कृष्ण भक्त कवि और रसखान,     Krishan bhakt kavi aur Raskhan


कृष्ण भक्त कवि और रसखान
रसखान का जीवन परिचय
कवि रसखान का असली नाम
रसखान की रचनाएं
रसखान की भाषा शैली
रसखान द्वारा रचित पद

हिन्दी साहित्य के भक्ति काल के प्रसिद्ध कवियों में कृष्ण भक्त कवि रसखान का नाम बहुत आदर के साथ लिया जाता है। मुसलमान कवियों ने भी हिन्दू देवी देवताओं का भजन कीर्तन करते हुए इनकी अनन्य श्रद्धा से भक्ति की है। रसखान का नाम ऐसे कवियों में अगली पंक्ति में लिया जाता है। कृष्ण भक्त होने के कारण इन्हें ब्रजभूमि से बहुत प्रेम था। यहां कृष्ण भक्त कवियों में रसखान का स्थान, रसखान का जीवन परिचय और ब्रजभूमि से उनके प्रेम के बारे में जानकारी प्राप्त करें।


रसखान का असली नाम, रसखान की जन्म तिथि

कृष्ण भक्त कवि रसखान का असली नाम सैयद इब्राहिम था। इनका जन्म 1548 ई में हुआ था। श्रीकृष्ण की लीलाओं और राधा - कृष्ण की प्रेम कहानी सुनकर ये इतने प्रभावित हुए कि ये श्रीकृष्ण के भक्त बन गये। इन्होंने अपना नाम रसखान रख लिया। रसखान जी स्वामी विट्ठल नाथ के शिष्य बन गये। उन्होंने स्वामी विट्ठल नाथ से दीक्षा लेकर ब्रज भूमि में ही अपना निवास बना लिया और और श्री कृष्ण के भक्ति गीतों की रचना करने लगे।

रसखान की भक्ति

कवि कृष्ण भक्त रसखान की अनुरक्ति श्री कृष्ण के साथ-साथ ब्रजभूमि से भी थी। रसखान की दो रचनाएं उपलब्ध हैं - " सुजान रसखान " और " प्रेम वाटिका "!  इनकी काव्य - भाषा सरल , सरस ब्रजभाषा है। 


रसखान के प्रसिद्ध पद


मानुष हौं तो वही रसखनि बसौं ब्रज गोकुल गांव के ग्वारन।

जौ पसु हौं तो कहां बस मेरो चरौं नित नंद की धेनु मंझारन।।

पाहन हौं तो वही गिरि को जो कियो हरि छत्र  पुरंदर धारन।

जौ खग हौं तो बसेरों करौं मिलि कालिंदी कूल कदंब के डारन।।




या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहुं पुर को तजि डारौं।

आठहुं सिद्धि नौ निधि के सुख नंद की गाय चराई बिसारौं।।

रसखान कबौं इन आंखिन सौं , ब्रज के बन बाग तडाग निहारौं।

कोटिक ए कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं।।


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