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Shiv prasad singh

 शिव प्रसाद सिंह की जीवनी, रचनाएं, और उपलब्धियां, Shiv Prasad Singh biography


सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ शिव प्रसाद सिंह हिन्दी साहित्य के जाने-माने लेखक और अध्यापकों में विशेष स्थान रखते हैं। प्रेमचंद के मरणोपरांत हिन्दी साहित्य में ग्रामीण संस्कृति और समस्याओं को चित्रित करने वाले साहित्यकारों में इनका स्थान सबसे ऊपर है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम ए , पीएच डी करने के बाद वहीं हिन्दी विभाग में प्राध्यापक बनकर विद्यार्थियों और शोधार्थियों में इन्होंने खूब नाम कमाया है। अलग-अलग बैतरणी, शैलूष, नीला चांद, मंजुशिमा आदि इनके प्रमुख उपन्यास हैं। आइए, इस लेख में हम शिव प्रसाद सिंह के बारे में जानकारी प्राप्त करें।


शिव प्रसाद सिंह की जन्म तिथि, जन्म स्थली, माता पिता एवं पत्नी, प्रारम्भिक शिक्षा एवं उच्च शिक्षा

हिन्दी साहित्य के सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ शिव प्रसाद सिंह का जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी जनपद अन्तर्गत जलालपुर ( जमानिया)  नामक गांव में एक संभ्रांत मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। इनके पिताजी का नाम चन्द्रिका प्रसाद सिंह एवं माता का नाम कुमारी देवी था। इनकी पत्नी का नाम धर्मा देवी धर्म की साक्षात मूर्ति थी। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा प्राइमरी स्कूल, जमालपुर में हुई ‌। बाद में इन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम ए, पीएच डी किया।


शिव प्रसाद सिंह का व्यक्तित्व एवं शारीरिक सौष्ठव


शिव प्रसाद सिंह का व्यक्तित्व काफी प्रभावशाली था। पक्का गेहूंआ रंग , भरा पूरा चेहरा, तीखी नाक, बड़ी बड़ी प्रभावी आंखें, औसत कद काठी के धनी शिव प्रसाद सिंह के व्यक्तित्व में  गंभीरता, अक्खड़ता ,धीरता का सुन्दर मेल दृष्टिगोचर होता है। सादा भेष-भूषा, धोती कुर्ता, गले में रूद्राक्ष की माला, दाहिने बांह में ताबीज इनके व्यक्तित्व को सादगी, ताजगी और ओज से ओत-प्रोत करती है।

शिव प्रसाद सिंह की प्रमुख रचनाएं

शिव प्रसाद सिंह की प्रमुख रचनाओं में उनके प्रमुख उपन्यास अलग-अलग बैतरणी, गली आगे मुड़ती है, शैलूष, मंजुशिमा, नीलाचांद आदि हैं। इन्होंने दर्जनों भर लोकप्रिय कहानियां भी लिखीं हैं। इनकी कहानी दादी मां, आर पार की माला, इन्तजार इन्हें भी है, कर्मनाशा की हार हिन्दी जगत में काफी लोकप्रिय हैं।


शिव प्रसाद सिंह के चिंतन का मुख्य आधार और इन पर प्रभाव


शिव प्रसाद सिंह के चिंतन का मुख्य आधार वर्ग चेतना और भारतीय संस्कृति की पहचान है। वे डॉ राममनोहर लोहिया के व्यक्तित्व से अधिक प्रभावित थे। उनकी कई कहानियों और उपन्यासों पर यह प्रभाव साफ दृष्टिगोचर होता है। इनके लोकप्रिय उपन्यास  ' गली आगे मुड़ती है ' में भाषा के शोषण को लेकर आंदोलन खड़ा हो जाता है। छोटे छोटे किसान, आदिवासी, हरिजन, खेतिहर, मजदूर, चरवाहे, घर की मजदूरी करने वाले कहार, सेवकाई करने वाले नाई, वनजारे, मुसहर आदि चरित्र शिव प्रसाद सिंह के उपन्यासों और कहानियों में बार बार आते हैं।


शिव प्रसाद सिंह का नारी जाति के प्रति दृष्टिकोण


शिव प्रसाद सिंह का नारी जाति के प्रति भी दृष्टिकोण बिल्कुल भिन्न है। उनका स्पष्ट मत है कि जो नारी खून को दूध में बदल सकती है वह प्रकृति से ही श्रेष्ठ है। वे नारी को समाज की अलग सत्ता न मानकर , समाज की क्रिया शक्ति मानते हैं। उन्हें नारी में वर्ग भेद दिखाई नहीं देता।


शिव प्रसाद सिंह की रूचि और शौक


शिव प्रसाद सिंह पुस्तकें पढ़ने के काफी शौकीन थे। साहित्य के अतिरिक्त इतिहास, दर्शन, ज्योतिष, गणित आदि विषयों के भी वे अच्छे ज्ञाता थे। महर्षि अरविन्द, आचार्य रजनीश में भी उनकी गहरी रुचि थी। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के वे शिष्य थे। उनकी कहानियों एवं उपन्यासों में व्यक्ति की संवेदना का बड़सूक्ष्मता के साथ  चित्रण मिलता है। वे मनुष्य के प्रति प्रतिबद्ध हैं।


शिव प्रसाद सिंह की साहित्यिक विशेषताएं एवं भाषा शैली

प्रेमचंद के बाद हिन्दी साहित्य में ग्राम जीवन चित्रण प्रायः लुप्त सा हो गया था, परन्तु स्वतंत्रता पश्चात् जिन साहित्य कारों ने इस रिक्तता को भरने का प्रयास किया है उनमें शिव प्रसाद सिंह की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही है। इनके कथा साहित्य का मूल क्षेत्र ग्रामीण जीवन है। प्रेमचंद गांव के जिन उपेक्षित  अंश को अपना संवेदनात्मक संस्पर्श नहीं दे पाए थे  और तमाम नारों आंदोलनों के प्रवाह में यह पीढ़ी भी जिन तक नहीं पहुंच पा रही थी, उस दलित मानव समाज, नटो, मुसहरों, कुंजरों, डोमो, चमारों आदि के दुःख दर्द को शिव प्रसाद सिंह की लेखनी ने पूरी सजगता और संजीदगी  के साथ व्यक्त किया है।


शिव प्रसाद सिंह की कहानियों और उपन्यासों की भाषा शैली पात्रानुकूल है। संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू के साथ-साथ ग्रामीण शब्दों का सटीक प्रयोग कोई शिव प्रसाद सिंह से सीखे। उनकी भाषा शैली के विषय में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की उक्ति युक्तिसंगत है। उन्होंने लिखा है -- " क्या कमाल की चित्रकारी सीखी है तुमने। भाषा पढ़कर तो कभी कभी लगता है कि मेरा शिव प्रसाद लिख रहा है। "

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