बिरसा मुंडा की जीवनी,. A biography of Birsa Munda
बिरसा मुंडा बहादुर और महान देशभक्त थे। मुंडारी आदिवासी उन्हें भगवान के रूप में याद करते हैं। बिरसा मुंडा भारत की आज़ादी के लिए खुलकर संघर्ष किया था। वे इतिहास में जीवित पुरुष हैं। बिरसा मुंडा धोती पहने रहते,शेष वदन नंगा लेकिन सिर पर पगड़ी जरूर रहती। आइए, इस लेख के माध्यम से बिरसा मुंडा के बारे में जानकारी प्राप्त करें।
बिरसा मुंडा का जन्म, जन्म स्थान
बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1874 ई में झारखंड के रांची जिले के उलिहातू नामक एक गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम सुगना मुंडा और माता का नाम करमी मुंडा था। उनका परिवार बहुत गरीब था। बड़ी मुश्किल से परिवार का पालन-पोषण होता था।
बिरसा मुंडा की शिक्षा
बचपन में ही बिरसा ने अपने पिता से तीर - और कमान तथा अन्य हथियार चलाना खीख लिया था। उनका निशाना अचूक था। उनका परिवार बहुत गरीब था इसलिए वे अपनी मौसी के यहां खटंगा नामक गांव में रहने लगे। वहीं एक मिशनरी स्कूल में बिरसा की शिक्षा प्रारंभ हुई। पढ़ने लिखने में भी उनकी गहरी रुचि थी। स्कूल से आकर वे जंगल में मौसी की बकरियों को लेकर चराने चले जाते थे। वहीं जंगल में धरती पर लिखने का अभ्यास करते।
एक दिन की बात है। वह लिखने में इतना मग्न हो गया कि एक जंगली भेड़िया बकरियों को उठाकर ले गया और इनको पता भी नहीं चला। मौसी को जब इस बात का पता चला तो वह क्रोध से आग बबूला हो गई। बिरसा को मौसी से मार भी पड़ी। इस बात से दुखी होकर बिरसा खटंगा छोड़कर अपने बड़े भाई कोम्ता के पास रहने लगे।
बिरसा का बांसुरी बजाना
बिरसा बांसुरी बहुत सुंदर बजाते थे। उसने स्वयं ही बांसुरी बजाना सीख लिया था। बांसुरी बजाने में उसे बहुत मज़ा आता था। जब वह बांसुरी बजाने लगता तो चिड़िया उसके कंधे पर आकर बैठ जाती और हिरण उसके पास आ जाते। उसकी इस कला को देखकर गांव के लोग हैरान रह जाते।
बिरसा ने गांव के एक धनवान ब्राह्मण आनंद पांडे के यहां नौकरी कर ली। वह खूब मन लगाकर काम करने लगा। आनंद पांडे भी उसे बहुत स्नेह करते। बिरसा मुंडा की पढ़ाई फिर से मिशन स्कूल में होने लगी। बिरसा को भी मुंडा सरदारों की तरह सुविधाएं मिलने लगी।
बिरसा मुंडा द्वारा अंग्रेजों का विरोध
1879 ई की बात है। मुंडा लोगों ने अंग्रेजी सरकार को एक पत्र लिखा और बताया कि छोटा नागपुर की जमीन मुंडा लोगों की संपत्ति है। अंग्रेजी सरकार उनकी मांगों पर विचार नहीं किया। इसके विरोध में 1881 ई में कुछ मुंडा मिशन छोड़कर बाहर आ गए। वे सब अपनी जमीन पाने के लिए दृढ़ संकल्प थे। इस बात से फादर नैट्रेट चिढ़ गया। वह मुंडा सरदारों को धोखेबाज और ठग कहने लगा। इस बात से बिरसा को भी बहुत आघात लगा। उसने भी मिशन छोड़ दिया।
बिरसा मुंडा का संदेश
उन दिनों आदिवासियों की दशा बहुत ख़राब थी। उनके परिवार को भोजन मिलना भी मुश्किल हो गया था। भूख और रोग से पीड़ित आदिवासी मुंडारियों की दुर्दशा देखकर बिरसा बहुत दुखी रहते। वे उनका जीवन सुधारने का उपाय खोजने लगे। बिरसा मुंडा ने आदिवासी युवकों का संगठन तैयार किया और उन्हें तीर - तलवार चलाने का भी प्रशिक्षण दिया।
उस समय आदिवासी समाज अज्ञान और रूढ़ियों से भरा हुआ था। वे जानते थे कि अज्ञानता ही सारी बुराईयों का जड़ है । बिरसा मुंडा कहते -" तुम लोग अनेक देवी देवताओं को छोड़कर केवल एक भगवान सिबोंगा की पूजा करो। सभी जीवों पर दया करो। सभी भगवान की संतान हैं। शिकार मत करो। जीव हत्या पाप है। मांस खाना और शराब पीना छोड़ दो। रोगियों की सेवा करो।" बिरसा मुंडा के समर्थन में लोग आगे आने लगे। लोग बिरसा मुंडा के इशारे पर मर मिटने को तैयार हो गए।
बिरसा मुंडा का अंग्रेज़ी सरकार से युद्ध और मृत्यु
बिरसा मुंडा के नेतृत्व में अंग्रेजों का विरोध होने लगा। जगह जगह लड़ाइयां होने लगीं। बिरसा मुंडा अंग्रेजों के आंखों के किरकिरी हो गये। जब बिरसा मुंडा को लगा कि अंग्रेजों का सामना करना अब और कठिन है तो वे अपनी पत्नी के साथ जंगल में छिप गए। किसी मुखबिर ने इसकी सूचना अंग्रेजों को दे दी। बिरसा पकड़े गए।
बिरसा मुंडा की हाथों में हथकड़ियां थी। सिपाही उन्हें घेर कर चल रहे थे। उनके पकड़ जाने पर सारे छोटा नागपुर में तहलका मच गया। बच्चे और महिलाएं छाती पीट पीट कर रो रही थी। 09 जून 1900 ई को रांची जेल में खून की उल्टियां करते हुए इस संसार से चले गए लेकिन आदिवासी मुंडारियों को अपनी धरती और हक के लिए जगा दिया है।
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