राजा राममोहन राय का जीवन परिचय: आधुनिक भारत के जनक और महान समाज सुधारक (Raja Ram Mohan Roy Biography in Hindi)
राजा राममोहन राय का जीवन परिचय: आधुनिक भारत के जनक और महान समाज सुधारक (Raja Ram Mohan Roy Biography in Hindi)
19वीं शताब्दी का शुरुआती दौर भारतीय इतिहास में एक ऐसा समय था जब हमारा समाज अंधविश्वास, जातिगत भेदभाव, बाल विवाह और सती प्रथा जैसी कुरीतियों के अंधकार में डूबा हुआ था। ऐसे समय में एक ऐसे युगपुरुष का प्रादुर्भाव हुआ जिसने अपनी तार्किक सोच, अदम्य साहस और क्रांतिकारी विचारों से भारतीय समाज की दिशा ही बदल दी। उन्हें दुनिया राजा राममोहन राय के नाम से जानती है।
उन्हें 'आधुनिक भारत का जनक' (Father of Modern India), 'भारतीय पुनर्जागरण का पिता' और 'नवप्रभात का तारा' कहा जाता है। उन्होंने भारतीय समाज को मध्यकालीन रूढ़िवादिता से निकालकर आधुनिकता की राह दिखाई।
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विवरण |
जानकारी |
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पूरा नाम |
राजा राममोहन राय |
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जन्म तिथि |
22 मई 1772 |
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जन्म स्थान |
राधानगर गाँव, हुगली जिला (बंगाल) |
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पिता का नाम |
रमाकांत राय |
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माता का नाम |
तारिणी देवी |
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निधन |
27 सितंबर 1833 (ब्रिस्टल, इंग्लैंड) |
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मुख्य पहचान |
समाज सुधारक, शिक्षाविद, लेखक, पत्रकार और दार्शनिक |
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संस्थाएँ |
आत्मीय सभा (1815), ब्रह्म समाज (1828) |
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प्रसिद्ध उपाधि |
'राजा' (मुगल सम्राट अकबर द्वितीय द्वारा प्रदत्त) |
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ऐतिहासिक कार्य |
सती प्रथा का उन्मूलन (1829), पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार |
प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि
राजा राममोहन राय का जन्म 22 मई 1772 को बंगाल के हुगली जिले के राधानगर गाँव में एक अत्यंत समृद्ध और धार्मिक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता रमाकांत राय एक वैष्णव थे, जबकि उनकी माता तारिणी देवी एक शाक्त परिवार से थीं। बचपन से ही राममोहन राय बहुमुखी प्रतिभा और कुशाग्र बुद्धि के धनी थे।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई, जहाँ उन्होंने बंगाली और फ़ारसी भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए उन्हें पटना भेजा गया, जहाँ उन्होंने अरबी और फ़ारसी भाषा का गहन अध्ययन किया। पटना में ही उन्होंने कुरान, इस्लामी दर्शन और सूफी संतों के विचारों को समझा। बाद में वे वाराणसी (बनारस) गए, जहाँ उन्होंने संस्कृत भाषा, वेद, उपनिषद और हिंदू दर्शन का गहरा अध्ययन किया।
वे केवल भारतीय भाषाओं तक सीमित नहीं रहे। आगे चलकर उन्होंने अंग्रेजी, ग्रीक, हिब्रू, लैटिन और फ्रेंच जैसी भाषाओं पर भी महारत हासिल की। इतनी भाषाओं का ज्ञान होने के कारण वे विभिन्न धर्मों के मूल ग्रंथों को स्वयं पढ़कर उनका तुलनात्मक अध्ययन कर सके।
सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष
राममोहन राय जब अपनी शिक्षा पूरी करके घर लौटे, तो उन्होंने पाया कि समाज में धर्म के नाम पर पाखंड, अमानवीय प्रथाएं और महिलाओं पर अत्याचार फैले हुए थे। उन्होंने इसके खिलाफ आवाज उठाने का संकल्प लिया।
1. सती प्रथा का उन्मूलन (Abolition of Sati System)
राममोहन राय के जीवन का सबसे ऐतिहासिक और महान कार्य सती प्रथा को समाप्त कराना था। उनके जीवन में एक ऐसी घटना घटी जिसने उन्हें भीतर तक हिलाकर रख दिया—जब उनके बड़े भाई जगमोहन की मृत्यु हुई, तो उनकी भाभी को जबरन पति की चिता पर जिंदा जला दिया गया (सती कर दिया गया)।
इस दर्दनाक घटना ने उनके मन में सती प्रथा के खिलाफ विद्रोह की ज्वाला जला दी। उन्होंने इसके खिलाफ बड़ा जन-आंदोलन चलाया, शास्त्रों के प्रमाण देकर यह सिद्ध किया कि सती प्रथा का हिंदू धर्मग्रंथों में कोई उल्लेख नहीं है, और अंग्रेजों पर दबाव बनाया। उनके अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप 1829 में लॉर्ड विलियम बैंटिक (तत्कालीन गवर्नर जनरल) ने सती प्रथा को गैर-कानूनी घोषित कर दिया और इसे एक दंडनीय अपराध बना दिया।
2. महिलाओं के अधिकारों का समर्थन
वे केवल सती प्रथा तक नहीं रुके। उन्होंने बाल विवाह, बहुविवाह और पर्दा प्रथा का घोर विरोध किया। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया और मांग की कि महिलाओं को भी संपत्ति में पुरुषों के समान अधिकार मिलने चाहिए।
धार्मिक सुधार और 'ब्रह्म समाज' की स्थापना
राममोहन राय मूर्तिपूजा, बहुदेववाद (कई ईश्वर की पूजा) और अनावश्यक कर्मकांडों के कड़े विरोधी थे। उनका मानना था कि सभी धर्मों का मूल तत्व एक ही है—एकेश्वरवाद (एक ही ईश्वर की उपासना)।
- आत्मीय सभा (1815): धार्मिक और सामाजिक विषयों पर स्वतंत्र चर्चा के लिए उन्होंने कलकत्ता में 'आत्मीय सभा' का गठन किया।
- ब्रह्म समाज (1828): 20 अगस्त 1828 को उन्होंने 'ब्रह्म समाज' की स्थापना की। ब्रह्म समाज का मुख्य उद्देश्य जाति-पात के भेदभाव को मिटाना, मूर्तिपूजा का खंडन करना और एक निराकार ईश्वर की भक्ति का संदेश फैलाना था। ब्रह्म समाज ने भारतीय पुनर्जागरण को आगे बढ़ाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई।
शिक्षा और पत्रकारिता के क्षेत्र में योगदान
राममोहन राय दूरदर्शी थे। वे जानते थे कि जब तक देशवासी आधुनिक शिक्षा और विज्ञान को नहीं अपनाएंगे, तब तक भारत का विकास संभव नहीं है।
- आधुनिक शिक्षा का प्रसार: उन्होंने संस्कृत और पारंपरिक शिक्षा के साथ-साथ अंग्रेजी, गणित, विज्ञान और पश्चिमी दर्शन की शिक्षा का पुरजोर समर्थन किया। उन्होंने कलकत्ता में 'हिंदू कॉलेज' (1817) और 'वेदांत कॉलेज' (1825) की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई।
- भारतीय पत्रकारिता के जनक: वे स्वतंत्र पत्रकारिता के पक्षधर थे। उन्होंने बंगाली भाषा में 'संवाद कौमुदी' और फ़ारसी भाषा में 'मिरात-उल-अखबार' नामक पत्रिकाओं का संपादन व प्रकाशन किया। इनके माध्यम से वे जनता को जागरूक करते थे और ब्रिटिश सरकार की गलत नीतियों की आलोचना भी करते थे।
'राजा' की उपाधि और अंतिम दिन
वर्ष 1831 में दिल्ली के तत्कालीन मुगल सम्राट अकबर द्वितीय ने अपनी पेंशन से संबंधित मामलों के सिलसिले में राममोहन राय को अपना राजदूत बनाकर इंग्लैंड भेजा। अकबर द्वितीय ने ही उनके सम्मान और विद्वत्ता से प्रभावित होकर उन्हें 'राजा' की उपाधि दी थी। इसके बाद से ही उन्हें 'राजा राममोहन राय' कहा जाने लगा।
इंग्लैंड यात्रा के दौरान उन्होंने ब्रिटिश संसद और जनता के सामने भारतीय समाज और शिक्षा के मुद्दों को मजबूती से रखा।
निधन
इंग्लैंड में रहते हुए अचानक उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। 27 सितंबर 1833 को ब्रिस्टल (Bristol) शहर में मेनिन्जाइटिस (मस्तिष्क ज्वर) नामक बीमारी के कारण इस महान समाज सुधारक का निधन हो गया। ब्रिस्टल के अर्नोस वेल कब्रिस्तान में आज भी उनकी समाधि स्थित है।
निष्कर्ष
राजा राममोहन राय केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि अपने आप में एक विचार और आंदोलन थे। उन्होंने उस दौर में क्रांति का बिगुल बजाया जब समाज में बदलाव की बात सोचना भी पाप माना जाता था। उनके द्वारा बोए गए सामाजिक और धार्मिक सुधारों के बीज ही आगे चलकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम का आधार बने। आधुनिक भारत हमेशा इस महान विभूति का ऋणी रहेगा।
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Writer Dr.Umesh Kumar Singh

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